Editor’s Note: During her stay in Japan from 1916 to 1920 the Mother translated and adapted some stories written by F. J. Gould. Her versions, written in French and first published as Belles Histoires, later appeared in English translation as Tales of All Times. The Mother explained that these stories were written for children “to discover themselves and follow a path of right and beauty.” The timeless nature of these stories makes them equally appealing to grown-ups, or shall we say, to all who aspire to be truly a child of the Mother.

In this issue, we are retelling a story titled ‘Modesty’ in multiple languages.

For a beautifully curated English narration of the story,
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Below we are presenting the Hindi, Odia and Sanskrit translations of the story.


In Hindi (Translation by Thakur Prasad)

इस जापानी घर के दरवाज़े पर कौन आ रहा है?

वह तो फूल सजाने में निपुण कलाकार है !

गृहस्वामी कुछ फूलों से भरा एक थाल, एक कैंची, एक चाकू, एक छोटी आरी और एक सुन्दर फूलदान लेकर आते हैं।

पुष्प-कलाकार कहते हैं, “महाशय! मेरे द्वारा इस सुन्दर कलश के योग्य गुलदस्ता बनाना सम्भव नहीं।”

कमरे से निकलते निकलते विनम्रतापूर्वक गृहस्वामी ने कहा, “पर मुझे विश्वास है यह काम आपसे हो जायेगा।”

अपने को अकेला पाकर, काट-छाँट करते, मोड़ते ओर बाँधते हुए कलाकार उस काम में लग जाते हैं जब तक कि एक सुन्दर नयनाभिराम फूलों का गुच्छा उस कलश में नहीं लगा लेते।

गृहस्वामी अपने मित्रों के साथ कमरे में आते हैं और कलाकार बाजू से बुदबुदा कर कहते हैं, “मेरा फूलों का यह गुच्छा बहुत ही तुच्छ है, इसे मैं ले जाता हूँ।

“नहीं, यह तो बहुत सुन्दर है,” मालिक कहते हैं।

टेबल के एक किनारे कलश के पास कलाकार ने एक कैंची रख दी है, जिससे उनका मतलब था कि यदि किसी को उस गुलदस्ते में कोई दोष दीखे तो वह उस को काट-छाँट कर और अधिक मनोहर बना सके।

कलाकार ने बहुत सुन्दर काम किया है, किन्तु वह स्वपन में भी अपने कार्य का गुणगान नहीं कर सकते हैं; वह मानते हैं कि उनसे कोई त्रुटि हो सकती है। वह विनयी हैं।

वास्तव में जापानी कलाकार शायद सोचते हैं कि उनका काम सराहनीय है। मैं यह तो नहीं कह सकती कि उनके मन में क्या भाव है, पर जो भी हो उनमें कोई अहंकार नहीं है और उनका आचरण सुखद है।

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पुष्पदान में पुष्प सुन्दर और मनोहर प्रकार से सजे हैं। परन्तु हम सराहना करें तो ही अच्छा है, कलाकार का स्वयं अपने कार्य की प्रशंसा करना शोभनीय नहीं है।

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In Sanskrit (Translation by Thakur Prasad and Kishor Tripathy)

अथ सनातनोपाख्यानात् – जापानदेशीयः पुष्पशिल्पी

कोऽयमायाति जापानीयस्य गृहस्य द्वारम् ?

अयं खलु पुष्पशिल्पी यः पुष्पविन्यासे प्रवीणः।

गृहस्य स्वामी तत्रानयति कैश्चित्पुष्पैः सहितामाधानिकां कर्तरिकां छुरिकां करपत्रकं चारुपुष्पभाजनमेकं च।

स भणति – श्रीमन्! नाहं शक्ष्यामि रचयितुम् एतादृश-सुन्दर-भाजनानुरूपं सुमनोगुच्छम्।

“त्वं शक्ष्यसीति अहं निश्चितोऽस्मि” – कक्षातः प्रस्थानं कुर्वाणो गृहस्वामी प्रत्यवदत्।

एकाकी विविक्तः सन् पुष्पशिल्पी कर्म प्रारभते – छेदन-कर्तन-संयोजनादिभिः क्रियाभिः मञ्जुलं सुमनोगुच्छं प्रस्तूय भाजनं पूरयति-यदस्ति-नेत्रमोदकरम्।

गृहस्वामी मित्रैः सह कक्ष्यं प्रविशति, शिल्पी एकस्मिन्पार्श्वे स्थित्वाऽस्पुटं भाषते  “मम पुष्पगुच्छं न तथा रुचिरमपसारयिव्यमेतत् इति।”

गृहस्वामी प्रतिभाषते, न हि एतत्सुन्दरमस्ति ।

उत्पीठिकाया एकस्मिन्पार्श्वे पुष्पाधानस्य समीपे शिल्पिना कर्तरिकां निहिता। अनेन तस्याशयोऽस्ति यदि पुष्पगुच्छो दोषः कश्चन स्यात् कोऽपि कर्तरिकां नीत्वा तत्र नयनपीड़ाकरं यत्स्यात् तत् छिन्दयात् ।

शिल्पी अतिमनोज्ञं कर्म कृतवान् किन्तु तद् गुणदृष्ट्या अतिशयिष्यते इति न स्वप्नबिभोरः भवेत्। सः अभिमानरहितः खलु। स विनयी अस्ति।

सम्भवतः जापानदेशीयः शिल्पी प्रकृतं मन्यते तस्य कृतिः प्रशंसामर्हतीति। अहं तदीय भावनां प्रकटयितुमसमर्थः। किन्तु तस्याचरणं प्रीतिप्रदं अस्ति आत्मानम् न श्लाघयति।

पुष्पाणि भाजने रुचिरं सज्जितानि अस्मन्नयनानि प्रीयन्ते च। तेषां प्रशंसनमस्माभिः करणीयं न तु शिल्पिना।

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In Odia (Translation by Basudev Sahoo)


~ English story design and other graphic design: Beloo Mehra

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